भगवती गायत्री का आवाहन तथा जप, सूर्य की प्रार्थना, पंचमहायज्ञ अनुष्ठान | Invocation and chanting of Bhagwati Gayatri, prayer to Sun, Panchmahayagya ritual

भगवती गायत्री का आवाहन तथा जप, सूर्य की प्रार्थना, पंचमहायज्ञ अनुष्ठान

नंदिकेश्वर का उपदेश:

नंदिकेश्वर ने सनत्कुमार को भगवती गायत्री की पूजा और पंचमहायज्ञ के महत्व को विस्तार से बताया। इसमें भगवती गायत्री का आवाहन, सूर्य की प्रार्थना, देव-ऋषि-पितृतर्पण, भस्मस्नान, और मंत्रस्नान का विवरण दिया गया है।

भगवती गायत्री का आवाहन और जप विधि

  1. आवाहन मंत्र:
    "आयातु वरदा देवी" मंत्र से भगवती गायत्री का आवाहन करें। इसके बाद पाद्य, आचमन, और अर्घ्य अर्पित करें।
  2. जप विधि:
    तीन बार प्राणायाम करें और बैठकर या खड़े होकर प्रणव (ॐ) के साथ गायत्री मंत्र का 1000, 500, या 108 बार जप करें।
  3. मातृ विसर्जन:
    अर्घ्य अर्पण कर देवी को "उत्तमे शिखरे देवी" मंत्र से विसर्जित करें।

सूर्य की प्रार्थना और सूक्त पाठ

  1. प्रार्थना:
    पूर्व दिशा की ओर देखकर "उदुत्यं जातवेदसम्" और "चित्र देवानाम्" मंत्रों से सूर्य का स्तवन करें।
  2. सूक्त पाठ:
    ऋग्वेद, यजुर्वेद, और सामवेद के सौर सूक्तों का पाठ करें।
  3. प्रदक्षिणा:
    सूर्य की तीन बार प्रदक्षिणा करें और आत्मा, अंतरात्मा, एवं परमात्मा का ध्यान करें।

देव-ऋषि-पितृतर्पण विधि

  1. तर्पण सामग्री:
    • देवताओं के लिए पुष्पयुक्त जल।
    • ऋषियों के लिए कुशयुक्त जल।
    • पितरों के लिए तिल और गंधयुक्त जल।
  2. तर्पण मुद्रा:
    • देवताओं के लिए यज्ञोपवीती (सव्य)।
    • ऋषियों के लिए निवीती (गले में यज्ञोपवीत)।
    • पितरों के लिए प्राचीनावीती (अपसव्य)।

पंचमहायज्ञ अनुष्ठान

  1. ब्रह्मयज्ञ:
    अपनी शाखा का अध्ययन और वेदपाठ।
  2. देवयज्ञ:
    अग्नि में अन्न का हवन।
  3. पितृयज्ञ:
    पितरों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण।
  4. भूतयज्ञ:
    सभी प्राणियों के लिए बलि प्रदान करना।
  5. मनुष्ययज्ञ:
    वेदज्ञ ब्राह्मणों को अन्न और अन्य दान।

ब्रह्मयज्ञ का महत्व

ब्रह्मयज्ञ को सर्वोपरि यज्ञ बताया गया है। इसके द्वारा सभी देवता, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, वेद, और पितर प्रसन्न होते हैं। यह यज्ञ ब्रह्मलोक की प्राप्ति और समस्त मनोरथों की पूर्ति करता है।

भस्मस्नान और मंत्रस्नान

ब्रह्मयज्ञ के पश्चात अंतः और बाह्य शुद्धि के लिए भस्मस्नान और मंत्रस्नान किया जाता है। यह आत्मा की शुद्धि और पवित्रता के लिए आवश्यक है।

सारांश:

इस अध्याय में भगवती गायत्री की पूजा, सूर्य की प्रार्थना, तर्पण, और पंचमहायज्ञ के माध्यम से आत्मा की शुद्धि और देवताओं की कृपा प्राप्त करने का मार्ग बताया गया है। यह जीवन को शुद्ध, संतुलित, और समृद्ध बनाने का एक आदर्श पथ प्रदर्शित करता है।

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